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All Details About KALAM SAT

All Details About KALAM SAT – हेलो दोस्तों मैं पिंकी यादव आज के अपने इस आर्टिकल में आप सभी का हार्दिक स्वागत करती हूँ। दोस्तों आज मैं अपने इस आर्टिकल के जरिए कलाम-सैट के बारे में पूरी जानकारी बताने वाली हूँ। तो चलिए शुरुआत करते हैं…

All Details About KALAM SAT:

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कलाम-सैट को विद्यार्थियों ने बनाया है। इसके साथ ही इमेजिंग उपग्रह माइक्रोसैट-आर को भी अंतरिक्ष में भेजा गया है। श्रीहरिकोटा के सतीश धवन स्पेस सेंटर से पीएसएलवी 44 लॉन्च व्हीकल के जरिए इन दोनों उपग्रहों को लांच किया गया।

ISRO के चेयरमैन डॉ. के सिवन ने लॉन्च के बाद देर रात तक इस मिशन के सफल होने का एलान किया। उन्होंने कलाम-सेट बनाने वाले विद्यार्थियों को “Space -kid “ कहा और उन्हें इसके लिए बहुत सारी बधाइयां भी दी। उन्होंने कहा है कि “ISRO भारतीयों की संपत्ति है। भारत से सभी विद्यार्थियों को निवेदन है कि वह अपने विज्ञान के नए अविष्कारों को लेकर हमारे पास जरूर आएं। हम उनके उपग्रह को लॉन्च करेंगे और हम यह चाहते हैं कि वह देश को विज्ञान की दिशा में आगे बढ़ाएं।

कलाम-सैट को चेन्नई के स्तिथ Space Education Form Space Kids India के नाम की स्टार्टअप कंपनी ने बनाया है।डॉ. के सिवान ने कहा है कि “इस मिशन में बहुत सारी नई तकनीक का इस्तेमाल हुआ है। पहली बार इसमें पीएसएलवी-सी 44 की पेलोड क्षमता को बढ़ाया गया है।”

“भारत के गणतंत्र दिवस के ठीक 2 दिन पहले ही इसका लॉन्च एक बड़ी सफलता और देश के लिए एक तोहफा के रूप में हुआ है।” प्रोजेक्ट के प्रबंधक आर हटन ने कहा, “यह पीएसएलवी सी 44 का एक और Successful मिशन है। यह इस लॉन्च व्हीकल का 46th लॉन्च है और अब तक इसे 44 बार सफलता भी मिल चुकी है, जो आपने आप में बहुत बड़ी कामयाबी है।” उन्होंने कहा, है कि “हमने पीएसएलवी व्हीकल परिवार में बहुत सारे और भी नयी व्हीकल शामिल किए हैं जिनमें पीएसएलवी- डीएल शामिल है।”

उन्होंने कहा है कि हमें यह जानकारी मिली है कि माइक्रोसैट-आर का सोलर पैनल अब खुल गया है और काम करने के लिए भी तैयार है। आर हटन ने कहा है कि “परियोजना के प्रबंधक के रूप में यह मेरा अंतिम काम है। मैं यह कह सकता हूँ कि यहीं पर मेरा जन्म भी हुआ है और मैं यही पर पला बढ़ा हूँ।”

“ISRO के चेयरमैन ने मुझ पर एक सिंपल सा काम अंतरिक्ष में इंसान को भेजने की जिम्मेदारी को सौंपी है। मुझे उम्मीद है कि Fixed समय के अंदर हम इस काम में सफल होंगे।”

इस मिशन की खास बात क्या है?

इस उपग्रह को ISRO के सबसे भरोसेमंद पीएसएलवी से लांच किया जा रहा है, जो कि 260 टन वाला फोर स्टेज रॉकेट है।

आमतौर पर इसके पहले तीन हिस्से धरती में वापस आ जाते हैं। वहीं पर चौथा और पांचवां यानी (आखरी) हिस्सा लिक्विड प्रोपेलेंट का इस्तेमाल करता है। इन हिस्सों को बहुत बार बंद करके शुरू किया जा सकता है ताकि अंतरिक्ष यान एकदम सही कक्षा में पहुंच सके। ऐसे में इस रॉकेट के चौथे हिस्से को गुरुवार को छोड़े जा रहे सेटेलाइट के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है, जो उसे 277 किलोमीटर की ऊंचाई पर ले जाएगा।

मगर ISRO इस रॉकेट के अंतिम हिस्से को नई क्षमता दे रहा है ताकि यह अंतरिक्ष में अगले 10 सालों तक सक्रिय रह सके। ISRO चीफ सिवान कहते हैं कि “आखिर हमें इतने मूल्यवान संसाधन को क्यों होना चाहिए। हमने इसके चौथे हिस्से को एक जांच की कक्षीय प्लेटफार्म में बदलने का फैसला किया है ताकि अंतरिक्ष में छोटे छोटे प्रयोग किए जा सके।”

एक पीएसएलवी रॉकेट की कीमत लगभग 196 करोड रूपए होती है। ये प्रयोगात्मक कक्षीय प्लेटफार्म Researchers को जीरो- ग्रेविटी जैसे वातावरण में प्रयोग करने में काफी मददगार साबित होगा।

कलाम-सैट के Steps :

ऐसे में इस रॉकेट का अंतिम हिस्सा पृथ्वी की कक्षा में ऊंचे स्थान पर पहुंच जाएगा जहां से एक कलाम-सैट अपने सिगनलों को भेजेगा। सिवान कहते हैं कि “यह पहला मौका है, जब ISRO का एक ऐसा प्रयोग कर रहे हैं जिससे एक मृत राकेट के हिस्से को दोबारा हासिल करके उसे जिंदा रखा जाएगा।”

इस नए दृष्टिकोण से Researcher अपने पेलोड और उपकरणों को लेकर कक्षा में जा सकते हैं जिसके बाद उसे मृत राकेट में बनी एक खास जगह में लगा सकते हैं। हालांकि ISRO पहली ऐसी एजेंसी नहीं है जिसने खराब हुई चीजों का दोबारा इस्तेमाल किया हो।

French Space Agency के अध्यक्ष जिन वेस-लेगाल कहते हैं कि उनकी संस्था ने भी इस दिशा में काम किया है मगर “अंतरिक्ष में प्रयोग करने के लिए किफायती तरीका उन्हें नहीं मिला।”

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